इक दिया जलता रहा हरदम हवा के सामने


इक दिया जलता रहा हरदम हवा के सामने
टिक न पायीं गर्दिशें  माँ की दुआ के सामने,

तय करें, ईमान से किसने गुज़ारी ज़िन्दगी,
देखते हैं आइये , चल कर ख़ुदा के सामने।

सीख ही लेगा कभी वो मयपरस्ती का हुनर,
आशियाँ जिसने बनाया मयकदा के सामने।

शोख़ थी उसकी नज़र, मासूम था चेहरा अगर,
ज़हर भी  रक्खा  हुआ था, यूँ दवा के सामने।

दस्तयाबी  पर था अपनी  फ़ख़्र  यूँ हमको मगर,
चल न पाया ज़ोर कुछ उसकी रज़ा के सामने।

वो ख़ुदा सब देखता है, लोग कहते हैं मगर,
ज़ुल्म कितने हो रहे इस गुमशुदा के सामने।

एक मामूली सा पत्थर बन के यह रह जाएगा,
सर  झुकाना  छोड़  दें  जो  देवता  के सामने।

मिल रही ताज़ी हवा हर वक़्त हमको इस तरह,
सांस उसकी कम नहीं ,   बादे-सबा के सामने।

मिल न पाया  नूर हमको  माह का यूँ उम्र भर,
थी मुक़ाबिल ज़ुल्फ़ भी काली घटा के सामने।

डाल ही दी आख़िरश उसने हक़ारत की नज़र,
रह  गई  इज़्ज़त  हमारी,   बेवफ़ा  के  सामने।

मिल ही जायेगा ख़ुदा से,एक ताज़ा जिस्म फिर,
गिड़गिड़ाना छोड़ भी दें,   इस क़ज़ा के सामने।

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